शनिवार, 18 जनवरी 2014

हिन्दी विभाग का इतिहास




हिन्दी विभाग का इतिहास

शासकीय हमीदिया महाविद्यालय के हिन्‍दी-विभाग की एक गौरवशाली परंपरा रही है। मूल्‍यपूर्ण जीवन और संरचनाओं की खोज में साहित्‍य की विशिष्‍ट भूमिका से जुड़कर इस विभाग ने अध्‍ययन-अध्‍यापन की परम्‍परा का विकास किया है। हिन्‍दी विभाग के अनेक प्राध्‍यापक अच्‍छे प्राध्‍यापकीय गुणों के साथ-साथ प्रतिभाशाली लेखक, कवि और आलोचक रहे हैं।
डॉ. श्‍यामसुंदर दीक्षित हिन्‍दी-विभाग के प्रथम पुरुषों में से एक हैं। शोधपरक आलोचना के प्रति इनका गहरा रुझान था। हिन्‍दी साहित्‍य में ‘भ्रमरगीत परम्‍परा पर इन्‍होंने शोध-कार्य किया था। आज से 30-35 वर्ष्‍  पहले जिन लोगों ने हिन्दी-साहित्य में स्नातक और स्नातकोत्तर का अध्ययन किया होगा वे सभी डॉ राजेश्वर गुरु को जानते होंगे। इनका ‘गोदान’ पर उल्लेखनीय कार्य था। इनकी प्रेमचन्द विषयक पुस्तकें साहित्य के अध्ययन में विशेषकर परीक्षा की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी मानी जाती थीं। डॉ. राजेश्वर गुरु हमारे ही हिन्दी विभाग के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे हैं। सन् 1960 के बाद जो विद्वान प्राध्यापक हिन्दी-विभाग से जुड़े उनमें विशेष उल्लेखनीय नाम हैं--- सर्वश्री शिवनाथ उपाध्याय, डॉ. कृष्णचन्द्र वर्मा, डॉ. कान्ति कुमार जैन, डॉ भगवतीप्रसाद शुक्ल, प्रो. चिंतामणि उपाध्याय, डॉ. श्रीमती शकुंतला दुबे, प्रो. रमेश बक्शी, प्रो. चन्द्रकांत देवताले, डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ. कामता प्रसाद, डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय, डॉ. संकटा प्रसाद मिश्र आदि।
            डॉ. कृष्‍णचंद्र वर्मा का हिन्‍दी अध्‍यापन के क्षेत्र में ऊँचा स्‍थान है। इनका हिन्‍दी साहित्‍य विषयक शोध-कार्य में महत्‍वपूर्ण योगदान है। डॉ. कांतिकुमार जैन का साहित्‍य के भाषिक अध्‍ययन के क्षेत्र में उल्‍लेखनीय योगदान रहा है। आपने हिन्‍दी साहित्‍य के अध्‍ययन-अध्‍यापन और लेखन को एक नयी दिशा प्रदान की। डॉ. श्रीमती शंकुतला दुबे विभाग के लिए विशेष रुप से स्‍मरणीय प्राध्‍यापिका हैं। वे प्रशासनिक पृष्‍ठभूमि से जुड़ी महिला थीं। ऊपर से सख्‍त किन्‍तु निर्मल और संवेदनशील स्‍वभाव की डॉ. शकुन्‍तला दुबे को आज भी विभाग के लोग स्‍मरण करते हैं। वे विभागाध्‍यक्ष की हैसियत से प्राध्‍यापकों की कर्तव्‍यपरायणता और नियमित कक्षाओं पर जोर देती थीं। योग्‍य और निष्‍ठावान प्राध्‍यापकों के प्रति उनके मन  में गहरा स्‍नेह-भाव होता था।
डॉ. धनंजय वर्मा, डॉ. कमलाप्रसाद और डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय जैसे हिन्‍दी के प्रख्‍यात आलोचकों की सेवा प्राप्‍त करने का ऐतिहासिक गौरव इस विभाग को हासिल हुआ है। डॉ. धनंजय वर्मा, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के योग्य शिष्य हैं।
आधुनिक हिन्दी कविता कहानी और आधुनिकता पर इनका उल्लेखनीय कार्य है। कुछ समय के लिये ये सागर विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। इन्होंने सन् 1995 में सेवा-निवृत्ति के बाद स्थायी रूप से भोपाल को अपना निवास बनाया।
वर्तमान में कार्यरत प्राध्यापक
डॉ. मृदुला निगम
डॉ. शारदा सिंह
डॉ. उषा शर्मा
डॉ. धर्मेन्द्र पारे
डॉ. आलोक शर्मा
डॉ. सुधीर कुमार शर्मा
डॉ. रोहिताश्व कुमार शर्मा

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