गुरुवार, 30 जनवरी 2014

सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला


सखि वसन्त आया ।

भरा हर्ष वन के मन,
   नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय-लतिका
मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका,
   मधुप-वृन्द बन्दी--
  पिक-स्वर नभ सरसाया ।

कफ़न प्रेमचंद  झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुध...