गुरुवार, 30 जनवरी 2014

महादेवी वर्मा



पिक की मधुमय वंशी बोली,

नाच उठी अलिनी भोली;
अरुण सजल पाटल बरसाता
तम पर मृदु पराग की रोली;
मृदुल अंक धर, दर्पण सा सर,
आज रही निशि दृग-इन्दीवर!
आज नयन आते क्यों भर भर?




कफ़न प्रेमचंद  झोपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अन्दर बेटे की जवान बीबी बुध...